
अथर्ववेद Atharvaveda Pdf In Hindi
Category: Veda Publisher: संस्कृत साहित्य प्रकाशन Pages: 1064 Language: Sanskrit with Hindi File Size: 7.3 MB More Detailsभूमिका
है-महाभाष्य के रचयिता महर्षि पतंजलि ने अथर्ववेद की नौ संहिताओं का उल्लेख किया
नवधाऽर्थवाणोवेदः.
इस का तात्पर्य यह है कि पतंजलि के समय अथर्ववेद की नौ संहिताएं उपलब्ध थीं. पतंजलि का समय २०० ईसा पूर्व से १५० ईसा पूर्व तक माना जाता है. इन संहिताओं के नाम इस प्रकार हैं-
(१) पिप्लाद, (२) स्तोद अथवा तोद, (३) मोद, (४) शौनकीय, (५) जावल, (६) जलद, (७) ब्रह्मदेव (८) देवदर्श (९) चारणवैद्य.
आजकल तीन संहिताएं उपलब्ध हैं- पिप्लाद, मोद और शौनक. इन में शौनक संहिता का आजकल बहुत प्रचार है. मैं ने जो अनुवाद प्रस्तुत किया है, उस का आधार शौनक संहिता ही है.
शौनक संहिता में २० कांड, ७३१ सूक्त तथा ५९८७ मंत्र हैं. अथर्ववेद की शौनक संहिता के कांडों की स्थिति इस प्रकार है-
आरंभ के सात कांडों में छोटेछोटे सूक्त हैं. प्रथम कांड के प्रत्येक सूक्त में ४ मंत्र, द्वितीय कांड के प्रत्येक सूक्त में ५ मंत्र, तृतीय कांड के प्रत्येक सूक्त में ६ मंत्र, चतुर्थ कांड के प्रत्येक सूक्त में ७ मंत्र तथा पंचम कांड के प्रत्येक सूक्त में ८ मंत्र हैं. षष्ठ कांड में १४२ सूक्त हैं और प्रत्येक सूक्त में कम से कम तीन मंत्र हैं. सप्तम कांड में ११८ सूक्त हैं. इन में अधिकांश सूक्त एक अथवा दो मंत्रों वाले हैं. आठवें से ले कर बारहवें कांड तक अधिक मंत्रों वाले बड़े सूक्त हैं. तेरहवें से अठारहवें कांड तक भी अधिक मंत्रों वाले सूक्त हैं. सत्रहवें कांड में ३० मंत्रों का केवल एक सूक्त है. उन्नीसवें कांड में ७२ सूक्त हैं और बीसवें कांड में १४३ सूक्त हैं.
अथर्ववेद में ऋग्वेद से लिए गए मंत्रों की संख्या १२०० है.
ऋग्वेद की विषय वस्तु
डा. उमाशंकर शर्मा ऋषि ने अपने ‘संस्कृत साहित्य का इतिहास’ में अथर्ववेद की विषय वस्तु का वर्णन करते हुए लिखा है-
“प्रथम कांड में विविध रोगों की निवृत्ति, बंधन से मुक्ति, राक्षसों सों का विनाश, सुख प्राप्ति आदि का निरूपण है. द्वितीय कांड में रोग, शत्रु एवं कृमिनाश तथा दीर्घायुष्य की प्रार्थना है. तृतीय कांड में शत्रुसेना का सम्मोहन, राजा का निर्वाचन, शाला निर्माण, कृषि तथा पशु पालन का विवरण है. चतुर्थ कांड में ब्रह्मविद्या, विषनाशन, राज्याभिषेक, वृष्टि, पापमोचन तथा ब्रह्मोदन का वर्णन है. पंचम कांड में मुख्यत ब्रह्म विद्या और कृत्या राक्षसी के परिहार से संबद्ध मंत्र हैं. षष्ठ कांड में दुःस्वप्ननाशन और अन्न समृद्धि के मंत्र हैं. सप्तम कांड आत्मा का वर्णन करता है. अष्टम कांड में मुख्यतया विराट् ब्रह्म का वर्णन है. नवम कांड में मधु विद्या, पंचोदन, अज, अतिथि सत्कार, गो महिमा एवं यक्ष्मा का नाश- ये विषय हैं. दशम कांड में कृत्या निवारण, ब्रह्मविद्या, शत्रु नाश के लिए वरणमणि, सर्पविषनाशन एवं ज्येष्ठ विषनाशन का वर्णन है. एकादश कांड में ब्रह्मोदन, रुद्र तथा ब्रह्मचर्य का वर्णन है. द्वादश कांड में प्रसिद्ध पृथ्वी सूक्त है, जिस में भूमि का महत्त्व वर्णित है. त्रयोदश कांड में पूर्णतयाः अध्यात्म का प्रकरण है. चतुर्दश कांड में विवाह संस्कार से संबद्ध कार्यों का वर्णन है. पंचदश कांड में व्रात्य ब्रह्म का गद्य में वर्णन है. षोडश कांड में दुःखमोचन के लिए गद्यात्मक मंत्र हैं. सप्तदश कांड में अभ्युदय के लिए प्रार्थना है. अष्टादश कांड पितृमेध से संबद्ध है. एकोनविंश कांड में विविध विषय हैं- यक्ष, नक्षत्र, विविध मणियां, छंदों के नाम, राष्ट्र का वर्णन, काल का महत्त्व. विंश कांड में सोमयाग का वर्णन तथा इंद्र की स्तुति है. इस के अंत में 10 सूक्त ‘कुंताय सूक्त’ के नाम से प्रसिद्ध हैं.
अथर्ववेद का महत्त्व
अथर्ववेद की विषयवस्तु शेष तीनों वेदों-ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद से भिन्न है.
इन तीनों वेदों में यज्ञों, देवस्तुतियों, स्वर्ग प्राप्ति आदि को महत्त्व दिया गया है. इस के विपरीत अथर्ववेद में वर्णित ओषधियां, जादू, टोनाटोटका आदि लौकिक जीवन से संबंधित हैं.
बहुत समय तक तीन वेदों की मान्यता रही थी. इस विषय में एक सूक्ति प्रस्तुत है-
त्रयोऽग्न्यस्त्रययो वेदास्त्रयोदेवास्त्रयोगुणाः
त्रयो दंडि प्रबंधश्च त्रिषुलोकेषुविश्रुताः..
अर्थात तीन अग्नियां, तीन वेद, तीन गुण और दंडी कवि के तीन प्रबंध-तीनों लोकों में प्रसिद्ध हैं.
अथर्ववेद की भाषा भी शेष तीन वेदों की भाषा से सरल है. इन दृष्टियों से स्पष्ट होता है कि अथर्ववेद की रचना बाद में हुई है. वैसे यज्ञों में अथर्ववेद को विशेष महत्त्व प्राप्त है. यज्ञ में चार वेदों से संबंधित चार ऋत्विज होते हैं. उन में प्रधान ऋत्विज् ब्रह्मा कहलाता है. वह अपनी देखरेख में यज्ञ कार्य कराता है और शेष ऋत्विजों को निर्देश देता है. ब्रह्मा एक प्रकार से यज्ञ का अध्यक्ष अथवा प्रधान होता है. यह ब्रह्मा अथर्ववेद का ही ज्ञाता होता है.
आचार्य बलदेव प्रसाद उपाध्याय के अनुसार- अथर्ववेद का विषय विवेचन अन्य वेदों की अपेक्षा नितांत विलक्षण है. इस में वर्णित विषयों का तीन प्रकार से विभाजन किया जा सकता है-
(१) अध्यात्म
(२) अधिभूत और
(३) अधिदैवत.
उन के अनुसार अथर्ववेद के सूक्तों का विषयगत विभाजन निम्नलिखित है-
(१) भैषज्य सूक्त-इन सूक्तों में रोगों की चिकित्सा और ओषधियों का वर्णन है.
(२) आयुष्य सूक्त-इन सूक्तों में दीर्घ आयु के लिए प्रार्थना की गई है.
(३) पौष्टिक सूक्त-इन सूक्तों में घर बनाने, हल जोतने, बीज बोने, अनाज
उत्पन्न करने आदि का वर्णन है.
(४) प्रायश्चित सूक्त-इन सूक्तों में अनेक प्रकार के पाप और निषिद्ध कर्मों के प्रायश्चित का वर्णन है.
(५) स्त्रीकर्म सूक्त-ये सूक्त विवाह तथा प्रेम से संबंधित हैं.
(६) राजकर्म सूक्त-इन सूक्तों का संबंध राजाओं और उन के कार्यों से है.
अथर्ववेद का विशेष सूक्त
अथर्ववेद का विशेष सूक्त ‘पृथ्वी सूक्त’ है. इस सूक्त में पृथ्वी को ‘माता’ कहा गया है.
इस के एक मंत्र का अंश है-
माता पृथिवी पुत्रो ऽ ११ ह पृथिव्याः.
अर्थात पृथ्वी मेरी माता है और मैं इस पृथ्वी का पुत्र हूं. यह भावना शेष तीनों वेदों में से किसी में नहीं है.
जहां तक संभव हुआ है, मैं ने सरल भाषा में अथर्ववेद के मंत्रों का आचार्य सायण के भाष्य के आधार पर अनुवाद किया है.
– गंगा सहाय शर्मा