
सामवेद | Samveda Pdf In Hindi
Category: Veda Publisher: संस्कृत साहित्य प्रकाशन Pages: 310 Language: Sanskrit with Hindi File Size: 2.5 MB More Detailsसामवेद
डा. रेखा व्यास एम. ए., पी-एच. डी.
संस्कृत साहित्य प्रकाशन
नई दिल्ली
अपनी बात
आमतौर पर सामवेद को ऋग्वेद के मंत्रों का संग्रह माना जाता है. छांदोग्य उपनिषद् में कहा भी गया है- ‘या ऋक् तत् साम’ अर्थात् जो ऋक् है, वह साम है.
इस का यह अर्थ कदापि नहीं है कि सामवेद में समस्त छंद ऋग्वेद से ही लिए गए हैं. सामवेद की अनेक ऋचाएं ऋग्वेद से भिन्न हैं. कुछ स्थलों पर सामवेद की ऋचाओं में ऋग्वेद की ऋचाओं से आंशिक साम्य दिखाई देता है. इसे पाठभेद के रूप में भी स्वीकार नहीं किया जा सकता है. यदि यह पाठभेद होता तो ऋचाएं उसी रूप और क्रम में ली गई होतीं, जिस रूप और क्रम में वे ऋग्वेद में ली गई हैं.
दूसरी बात यह है कि यदि ऋग्वेद से केवल गायन के लिए ऋचाओं का सामवेद के रूप में संग्रह किया गया होता तो केवल गेय मंत्रों का ही संग्रह होना चाहिए था, जबकि उपलब्ध सामवेद में लगभग ४५० मंत्र पूरी तरह गेय नहीं हैं.
तीसरी बात यह है कि अगर सामवेद के मंत्र ऋग्वेद से उधृत माने जाएं, तो उन के रूप और स्वर निर्देश ऋग्वेद से भिन्न हैं. ऋग्वेदीय मंत्रों में उदात्त, अनुदात्त और स्वरित स्वर पाए जाते हैं, जबकि सामवेदीय मंत्रों में सप्त स्वर विधान है.
इन दृष्टिकोणों से देखने पर स्पष्ट प्रतीत होता है कि सामवेद के मंत्र ऋग्वेद से ऋण स्वरूप नहीं लिए गए हैं. उन की अपनी स्वतंत्र सत्ता है. वे उतने ही स्वतंत्र हैं, जितने ऋग्वेद के मंत्र.
हां, एक बात अवश्य है कि ऋग्वेद और सामवेद के मंत्रों में वर्ण्य विषयगत अंतःसंबंध है. ऋग्वेद के समान सामवेद में भी अग्नि, इंद्र, सोम, अश्विनीकुमारों आदि की स्तुति की गई है. इसी माध्यम से उन का स्वरूप निर्धारित करने का प्रयास किया गया है.
ऋग्वेद के समान सामवेद से भी तत्कालीन उन्नत समाज का पता चलता है. चूंकि सामवेद ऋग्वेद के बाद की रचना है, इसलिए उक्त संदर्भ में सामवेद का अध्ययन रोचक ही नहीं, ज्ञानवर्द्धक भी हो सकता है. इतना ही नहीं, सामवेद का अध्ययन ऋग्वेद काल के पश्चात विकसित लोककला और संस्कृति को भी रेखांकित करता है.
इस प्रकार सामवेद को ऋग्वेद का पूरक कहा जा सकता है. इस की महत्ता ऋग्वेद से किसी भी रूप में कम नहीं मानी जा सकती है. इसीलिए यह वेदत्रयी (ऋक्, यजु और सामवेद) में गिना जाता है. गीता में उपदेशक कृष्ण ने ‘वेदानां सामवेदो ऽ स्मि’ कह कर सामवेद की विशिष्टता की ओर ही संकेत किया है. यहां एक बात और ध्यान देने योग्य है कि आज ‘वेद’ शब्द भले ही चार वेदों-ऋक्, यजु, अथर्व और साम के साथ जुड़ कर ग्रंथवाची हो गया हो, किंतु मूल रूप में यह ज्ञान का ही बोधक रहा है. आरंभ में इन चारों को मिला कर एक ही ‘वेद ग्रंथ’ माना जाता था, जैसा कि महाभारत में कहा भी गया है-
एक एव पुरा वेदः प्रणवः सर्ववाङ्मयः.
बाद में आकारगत विशालता को देखते हुए इस के चार भाग किए गए-ऋग्वेद, अथर्ववेद, यजुर्वेद और सामवेद. इन्हें ‘चतुर्वेद’ कहा जाता है. श्रुति परंपरा से पीढ़ी दर पीढ़ी निरंतर विकसित होते रहने वाले इस ज्ञान के भंडार का संभवतया प्रथम विभाजन व्यास ने किया था. यह विभाजन प्रमुखतया साहित्यिक विधाओं पर आधारित है-पद्य, गद्य और गान. सामान्यतया किसी भी भाषा का साहित्य इन्हीं तीन रूपों में पाया जाता है. इस दृष्टि से ऋग्वेद और अथर्ववेद पद्य प्रधान, यजुर्वेद गद्य प्रधान और सामवेद गान प्रधान हैं.
सामवेद की आचार्य परंपरा
सामवेद के आदि आचार्य जैमिनि माने जाते हैं. वायु, भागवत, विष्णु आदि पुराणों से भी इस कथन की पुष्टि होती है. पुराणों के अनुसार, वेदव्यास ने अपने शिष्य जैमिनि को सामवेद की शिक्षा दी थी. जैमिनि के बाद सुमंतु, सुन्वान, स्वकीय सूनु सुकर्मा तक पीढ़ी दर पीढ़ी यह अध्ययन परंपरा जारी रही. सुकर्मा ने सामवेद संहिता का व्यापक विस्तार किया.
पौराणिक उल्लेखों के अनुसार सामवेद की एक हजार शाखाएं थीं. आचार्य पतंजलि ने भी इस की पुष्टि की है- ‘सहस्रवर्मा सामवेदः.’ आज इन में से केवल तीन ही शाखाएं मिलती हैं- कौथुमीय, राणायणी और जैमिनीय.
तीनों शाखाओं में उपलब्ध सामवेद की ऋचाओं की संख्या तो अलगअलग है ही, उन में पाठभेद भी मिलता है. ब्राह्मण तथा पुराण ग्रंथों के अनुसार, साम मंत्रों (ऋचाओं) के पदों की संख्या एक लाख से भी अधिक है लेकिन सामवेद की कुल उपलब्ध ऋचाओं की संख्या अधिक नहीं है.
सामवेद के मुख्यतया दो भाग हैं- आर्चिक और गान. आर्चिक का अर्थ है ऋचाओं का समूह. इस के दो भाग हैं- पूर्वार्चिक और उत्तरार्चिक.
पूर्वार्चिक में छह अध्याय हैं. हर अध्याय में कईकई खंड हैं. इन्हें ‘दशति’ भी कहा गया है. ‘दशति’ से दस (संख्या) का बोध होता है. किंतु हर खंड में ऋचाओं की संख्या १० नहीं है. किसी में यह संख्या १० से कम है तो किसी में ज्यादा भी. इसीलिए इसे ‘दशति’ न कह कर खंड कहना अधिक उचित प्रतीत होता है.
सामवेद के पहले अध्याय में अग्नि से संबंधित ऋचाएं हैं. इसलिए इसे ‘आग्नेय पर्व’ कहा गया है. दूसरे से चौथे अध्याय तक इंद्र की स्तुति की गई है. इसलिए यह ‘ऐंद्र पर्व’ कहलाया.
पांचवां अध्याय पवमान पर्व कहलाता है. इस में सोम विषयक ऋचाएं हैं, जो ऋग्वेद के नवम मंडल से ली गई हैं. पहले से पांचवें अध्याय तक की ऋचाएं ‘ग्राम गान’ कहलाती हैं.
छठे अध्याय का शीर्षक है ‘आरण्यक पर्व’. इस में यद्यपि देवताओं और छंदों की भिन्नता है तथापि इस में गायन संबंधी एकता दिखाई देती है. इस अध्याय की ऋचाएं ‘अरण्य गान’ कही गई हैं, पूर्वार्चिक के छह अध्यायों में कुल ६४० ऋचाएं हैं.
उत्तरार्चिक में २१ अध्याय हैं. ऋचाओं की संख्या १२२५ है. इस प्रकार सामवेद में कुल १८६५ ऋचाएं हैं.
यह अनुवाद
सामवेद की इन ऋचाओं का यह अनुवाद सायण भाष्य पर आधारित है, क्योंकि सायणाचार्य ने वैदिक ऋचाओं (मंत्रों) को समझने के लिए यास्काचार्य द्वारा निर्दिष्ट तीनों साधनों-परंपरागत ज्ञान, तर्क एवं मनन का पूरा सहारा लिया था. इस से भी बड़ी बात यह थी कि उन्होंने अन्य आचार्यों के समान वैदिक ऋचाओं को किसी विशेष वाद का चश्मा पहन कर नहीं देखा है.
सायणाचार्य ने वैदिक ऋचाओं के प्रसंग के अनुसार मानव जीवन, यज्ञ और अध्यात्म संबंधी अर्थ दिए हैं. वैसे अधिकतर अर्थ मानव जीवन से संबंधित ही हैं. यज्ञ और अध्यात्म से जुड़े अर्थ प्रायः कम स्थानों पर ही दिए गए हैं. इन्हीं कारणों से अनुवाद करते समय सायण भाष्य को आधार बनाया गया है.
अनुवाद के दौरान इस बात का विशेष ध्यान रखा गया है कि सायणाचार्य का आशय पूरी तरह स्पष्ट हो जाए. अनुवाद की भाषा यथासंभव सरल एवं सुबोध रखी गई है, ताकि आम हिंदी पाठक भी आसानी से समझ सकें कि वास्तव में वेदों में क्या है!
– प्रकाशक